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_aVerma, Nirmal _923953 |
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| 245 |
_aVe din | _bवे दिन / _cNirmal Verma |
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| 260 |
_aNew Delhi : _bBhartiye Gyapith, _c2010. |
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| 300 | _a212p. | ||
| 520 | _aनिर्मल वर्मा के कथा-शिल्प में उसी तरह मौजूद रहता है, जैसे हमारे जीवन में—लगातार मौजूद लेकिन अदृश्य। उससे हमारे दुःख और सुख तय होते हैं, वैसे ही जैसे उनके कथा-पात्रों के होते हैं। कहानी का विस्तार उसमें बस यह करता है कि इतिहास के उन मूक और भीड़ में अनचीन्हे ‘विषयों’ को एक आलोक-वृत्त से घेरकर नुमायाँ कर देता है, ताकि वे दिखने लगें, ताकि उनकी पीड़ा की सूचना एक जवाबी सन्देश की तरह इतिहास और उसकी नियन्ता शक्तियों तक पहुँच सके। इस प्रक्रिया में अगर उनकी कथा कुछ ऐसे व्यक्तियों को रच देती है जिनकी वैयक्तिकता की आभा हमारे लिए ईर्ष्या का कारण हो उठे, तो यह उनका व्यक्तिवाद नहीं है, व्यक्ति के स्तर पर एक वैकल्पिक मनुष्य का ख़ाक़ा तैयार करने की कोशिश है। | ||
| 650 | 4 |
_aHindi fiction _923954 |
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| 650 | 4 |
_aIndians — Foreign countries — Fiction _923955 |
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_aInterpersonal relations — Fiction _923956 |
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| 650 | 4 |
_aLove stories _923957 |
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| 650 | 4 |
_aPsychological fiction _923958 |
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| 942 | _cBK | ||
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